स्वप्न भी छल, जागरण भी! भूत केवल जल्पना है, औ’ भविष्यत कल्पना है, वर्तमान लकीर भ्रम की! और है चौथी शरण भी!...
मैं अपने से पूछा करता। निर्मल तन, निर्मल मनवाली, सीधी-सादी, भोली-भाली, वह एक अकेली मेरी थी, दुनियाँ क्यों अपनी लगती थी?...
किस कर में यह वीणा धर दूँ? देवों ने था जिसे बनाया, देवों ने था जिसे बजाया, मानव के हाथों में कैसे इसको आज समर्पित कर दूँ?...
जब करूँ मैं काम, प्रेरणा मुझको नियम हो, जिस घड़ी तक बल न कम हो, मैं उसे करता रहूँ यदि काम हो अभिराम!...
गिनती के गीत सुना पाया! जब जग यौवन से लहराया, दृग पर जल का पर्दा छाया, फिर मैंने कंठ रुँधा पाया,...
पाप मेरे वास्ते है नाम लेकर आज भी तुमको बुलाना। है वही छाती कि जो अपनी तहों में राज़ कोई हो छिपाए, जो कि अपनी टीस अपने आप झेले...
मुझको है विश्वास किसी दिन घायल हिंदुस्तान उठेगा। दबी हुई दुबकी बैठी हैं कलरवकारी चार दिशाएँ,...
मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है| आभारी हूँ तुमने आकर मेरा ताप-भरा तन देखा, आभारी हूँ तुमने आकर...
खोजता है द्वार बन्दी! भूल इसको जग चुका है, भूल इसको मग चुका है, पर तुला है तोड़ने पर तीलियाँ-दीवार बन्दी!...
ओ गगन के जगमगाते दीप! दीन जीवन के दुलारे खो गये जो स्वप्न सारे, ला सकोगे क्या उन्हें फिर खोज हृदय समीप?...
अमित को बारंबार बधाई! आज तुम्हारे जन्म-दिवस की, मधुर घड़ी फिर आई। अमित को बारंबार बधाई!...
जन्म दिन फिर आ रहा है! हूँ नहीं वह काल भूला, जब खुशी के साथ फूला सोचता था जन्मदिन उपहार नूतन ला रहा है!...
विश्व को उपहार मेरा! पा जिन्हें धनपति, अकिंचन, खो जिन्हें सम्राट निर्धन, भावनाओं से भरा है आज भी भंडार मेरा!...
कहते हैं, तारे गाते हैं! सन्नाटा वसुधा पर छाया, नभ में हमने कान लगाया, फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं!...
हे मन के अंगार, अगर तुम लौ न बनोगे, क्षार बनोगे। जो न करेगा सीना आगे पीठ उसे खींचेगी पीछे, जो ऊपर को उठ न सकेगा...
तूने अभी नहीं दुख पाए। शूल चुभा, तू चिल्लाता है, पाँव सिद्ध तब कहलाता है, इतने शूल चुभें शूलों के चुभने का पग पता न पाए।...
अगणित उन्मादों के क्षण हैं, अगणित अवसादों के क्षण हैं, रजनी की सूनी की घडियों को किन-किन से आबाद करूं मैं! क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!...
है यह पतझड़ की शाम, सखे ! नीलम-से पल्लव टूट गए, मरकत-से साथी छूट गए, अटके फिर भी दो पीत पात...
ठहरा-सा लगता है जीवन। एक ही तरह से घटनाएँ नयनों के आगे आतीं हैं, एक ही तरह के भावों को...
डूबता अवसाद में मन! यह तिमिर से पीन सागर, तल-तटों से हीन सागर, किंतु हैं इनमें न धाराएँ, न लहरें औ’, न कम्पन!...
साथी, अन्त दिवस का आया! तरु पर लौट रहे हैं नभचर, लौट रहीं नौकाएँ तट पर, पश्चिम की गोदी में रवि की श्रात किरण ने आश्रय पाया!...
क्या दंड़ के मैं योग्य था! चलता रहूँ यह चाह दी, पर एक ही तो राह दी, किस भाँति होती दूसरी इस देह-यात्रा की कथा!...
आज़ादी का दिन मना रहा हिन्दोस्तान। आज़ादी का आया है पहला जन्म-दिवस, उत्साह उमंगों पर पाला-सा रहा बरस, यह उस बच्चे की सालगिरह-सी लगती है...
आ गई बरसात, मुझको आज फिर घेरे हुए बादल। वायु के ये नभ झकोरे छू मुझे फिर भाग जाते हैं, क्या पता इनको कि दिल के...
आज आहत मान, आहत प्राण! कल जिसे समझा कि मेरा मुकुर-बिंबित रूप, आज वह ऐसा, कभी की हो न ज्यों पहचान।...
साथी, देख उल्कापात! टूटता तारा न दुर्बल, चमकती चपला न चंचल, गगन से कोई उतरती ज्योति वह नवजात!...
तन के सौ सुख, सौ सुविधा में मेरा मन बनवास दिया-सा। महलों का मेहमान जिस तरह तृण कुटिया वह भूल न पाए जिसमें उसने हों बचपन के...
मैं भूला-भूला-सा जग में! अगणित पंथी हैं इस पथ पर, है किंतु न परिचित एक नजर, अचरज है मैं एकाकी हूँ जग के इस भीड़ भरे मग में।...
"बुद्धं शरणं गच्छामि, ध्मंबुद् शरणं गच्छाेमि, संघं शरणं गच्छामि।" बुद्ध भगवान,...
चंचला के बाहु का अभिसार बादल जानते हों, किंतु वज्राघात केवल प्राण मेरे, पंख मेरे। कब किसी से भी कहा मैंने कि उसके रूप-मधु की एक नन्हीं बूँद से भी आँख अपनी सार आया,...
यह अनुचित माँग तुम्हारी है! रोएँ-रोएँ तन छिद्रित कर कहते हो, जीवन में रस भर! हँस लो असफलता पर मेरी, पर यह मेरी लाचारी है।...
स्वर्ग के अवसान का अवसान! एक पल था स्वर्ग सुन्दर, दूसरे पल स्वर्ग खँड़हर, तीसरे पल थे थकिर कर स्वर्ग की रज छान!...
अब हेमंत अंत नियराया, लौट न आ तू, गगन-बिहारी। खोल उषा का द्वार झाँकती बाहर फिर किरणों की जाली, अंबर की डयोढ़ी पर अटकी...
सब ग्रह गाते, पृथ्वी रोती। ग्रह-ग्रह पर लहराता सागर ग्रह-ग्रह पर धरती है उर्वर, ग्रह-ग्रह पर बिछती हरियाली,...
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है। देखी मैंने बहुत दिनों तक दुनिया की रंगीनी, किंतु रही कोरी की कोरी...
प्रिय, देख मिलन मेरा-तेरा क्यों तारे जलते हैं? पत्ते सहसा आपस में यों क्यों बात लगे करने? मलयानिल बहकर अंबर के...
हृदय सोच यह बात भर गया! उर में चुभने वाली पीड़ा, गीत-गंध में कितना अंतर, कवि की आहों में था जादू काँटा बनकर फूल झर गया।...
तुम तूफ़ान समझ पाओगे? गीले बादल, पीछे रजकण, सूखे पत्ते, रूखे तृण घन लेकर चलता करता 'हरहर'- इसका गान समझ पाओगे?...