मैं भूला भूला सा जग में
मैं भूला-भूला-सा जग में! अगणित पंथी हैं इस पथ पर, है किंतु न परिचित एक नजर, अचरज है मैं एकाकी हूँ जग के इस भीड़ भरे मग में। मैं भूला-भूला-सा जग में! अब भी पथ के कंकड़-पत्थर, कुश, कंटक, तरुवर, गिरि गह्वर, यद्यपि युग-युग बीता चलते, नित नूतन-नूतन ड़ग-ड़ग में! मैं भूला-भूला-सा जग में! कर में साथी जड़ दण्ड़ अटल, कंधों पर सुधियों का संबल, दुख के गीतों से कंठ भरा, छाले, क्षत, क्षार भरे पग में! मैं भूला-भूला-सा जग में!

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