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अर्श के तारे तोड़ के लाएँ काविश लोग हज़ार करें 'मीर' की बात कहाँ से पाएँ आख़िर को इक़रार करें आप इसे हुस्न-ए-तलब मत समझें ना कुछ और शुमार करें शेर इक 'मीर' फ़क़ीर का हम जो आप के गोश गुज़ार करें...
वफ़ा-ए-वादा नहीं वादा-ए-दिगर भी नहीं वो मुझ से रूठे तो थे लेकिन इस क़दर भी नहीं बरस रही है हरीम-ए-हवस में दौलत-ए-हुस्न गदा-ए-इश्क़ के कासे में इक नज़र भी नहीं...
इस हवस में कि पुकारे जरस-ए-गुल की सदा दश्त-ओ-सहरा में सबा फिरती है यूँ आवारा जिस तरह फिरते हैं हम अहल-ए-जुनूँ आवारा हम पे वारफ़्तगी-ए-होश की तोहमत न धरो...
चमकते लफ़्ज़ सितारों से छीन लाए हैं हम आसमाँ से ग़ज़ल की ज़मीन लाए हैं वो और होंगे जो ख़ंजर छुपा के लाते हैं हम अपने साथ फटी आस्तीन लाए हैं...
नदी की विस्तृत वेला शान्त, अरुण मंडल का स्वर्ण विलास; निशा का नीरव चन्द्र-विनोद, कुसुम का हँसते हुए विकास।...
मेरा जीवन भरा हुआ है विहगों के मृदु रागों में। हृदय गूँजता है झींगुर के-- अविदित बँधे विहागों में॥...
ये जगह अहल-ए-जुनूँ अब नहीं रहने वाली फ़ुर्सत-ए-इश्क़ मयस्सर कहाँ पहले वाली कोई दरिया हो कहीं जो मुझे सैराब करे एक हसरत है जो पूरी नहीं होने वाली...
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हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...
गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...
हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...
फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...
हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...
है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...
उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...
गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...
चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...