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फूँका है किस ने गोश-ए-मोहब्बत में ऐ ख़ुदा अफ़्सून-ए-इंतिज़ार तमन्ना कहें जिसे...

ख़ैर दोज़ख़ में मय मिले न मिले शैख़-साहब से जाँ तो छुटेगी...

रात तो सारी गई सुनते परेशाँ-गोई 'मीर'-जी कोई घड़ी तुम भी तो आराम करो...

अंध मोह के बंध तोड़कर तु स्वच्छंद सुरा कर पान, क्षण भर मधु अधरों का मिलना, यह जीवन विधि का वरदान!...

बाम पर आने लगे वो सामना होने लगा अब तो इज़हार-ए-मोहब्बत बरमला होने लगा...

तम ने जीवन-तरु को घेरा! टूट गिरीं इच्छा की कलियाँ, अभिलाषा की कच्ची फलियाँ, शेष रहा जुगुनूँ की लौ में आशामय उजियाला मेरा!...

मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार पथ ही मुड़ गया था। गति मिली मैं चल पड़ा पथ पर कहीं रुकना मना था,...

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत ब'अद का है पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएँ कैसे...

शम-ए-दिल शम-ए-तमन्ना न जला मान भी जा तेज़ आँधी है मुख़ालिफ़ है हवा मान भी जा ऐसी दुनिया में जुनूँ ऐसे ज़माने में वफ़ा इस तरह ख़ुद को तमाशा न बना मान भी जा...

तूफ़ान आया था कुछ पेड़ों के पत्ते टूट गए हैं कुछ की डालें और कुछ तो जड़ से ही उखड़ गए हैं...

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हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

हटाओ आइना उम्मीद-वार हम भी हैं तुम्हारे देखने वालों में यार हम भी हैं तड़प के रूह ये कहती है हिज्र-ए-जानाँ में कि तेरे साथ दिल-ए-बे-क़रार हम भी हैं...

कहा जो मैं ने कि यूसुफ़ को ये हिजाब न था तो हँस के बोले वो मुँह क़ाबिल-ए-नक़ाब न था शब-ए-विसाल भी वो शोख़ बे-हिजाब न था नक़ाब उलट के भी देखा तो बे-नक़ाब न था...

पूछा न जाएगा जो वतन से निकल गया बे-कार है जो दाँत दहन से निकल गया ठहरें कभी कजों में न दम भर भी रास्त-रौ आया कमाँ में तीर तो सन से निकल गया...

साफ़ कहते हो मगर कुछ नहीं खुलता कहना बात कहना भी तुम्हारा है मुअम्मा कहना रो के उस शोख़ से क़ासिद मिरा रोना कहना हँस पड़े उस पे तो फिर हर्फ़-ए-तमन्ना कहना...

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा हया यक-लख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता...

वस्ल की शब भी ख़फ़ा वो बुत-ए-मग़रूर रहा हौसला दिल का जो था दिल में ब-दस्तूर रहा उम्र-ए-रफ़्ता के तलफ़ होने का आया तो ख़याल लेकिन इक दम की तलाफ़ी का न मक़्दूर रहा...

या-रब शब-ए-विसाल ये कैसा गजर बजा अगले पहर के साथ ही पिछ्ला पहर बजा आवाज़-ए-सूर सुन के कहा दिल ने क़ब्र में किस की बरात आई ये बाजा किधर बजा...

गहन है यह अंधकारा; स्वार्थ के अवगुंठनों से हुआ है लुंठन हमारा। खड़ी है दीवार जड़ की घेरकर,...

सरलता से कुछ नहीं मुझको मिला है, जबकि चाहा है कि पानी एक चुल्लू पिऊँ, मुझको खोदना कूआँ पड़ा है....