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निरंजन धन तुम्हरो दरबार । जहाँ न तनिक न्याय विचार ।। रंगमहल में बसें मसखरे, पास तेरे सरदार । धूर-धूप में साधो विराजें, होये भवनिधि पार ।।...

रहा न हल्क़ा-ए-सूफ़ी में सोज़-ए-मुश्ताक़ी फ़साना-हा-ए-करामात रह गए बाक़ी ख़राब कोशक-ए-सुल्तान ओ ख़ानक़ाह-ए-फ़क़ीर फ़ुग़ाँ कि तख़्त ओ मुसल्ला कमाल-ए-रज़्ज़ाक़ी...

उस के दर तक किसे रसाई है वो ही जाएगा जिस की आई है बात इक दिल में मेरे आई है गर कहूँ तो अभी लड़ाई है...

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे...

अब दौर-ए-आसमाँ है न दौर-ए-हयात है ऐ दर्द-ए-हिज्र तू ही बता कितनी रात है हर काएनात से ये अलग काएनात है हैरत-सरा-ए-इश्क़ में दिन है न रात है...

छोड़ नहीं सकते रे यदि जन जाति वर्ग औ’ धर्म के लिए रक्त बहाना बर्बरता को संस्कृति का बाना पहनाना— तो अच्छा हो छोड़ दें अगर...

हम नदी के साथ-साथ सागर की ओर गए पर नदी सागर में मिली हम छोर रहे: ...

माए नी असीं करन ब्रेहों दा तीरथ हां अज्ज चल्ले खोटे दम मुहब्बत वाले बन्न्ह उमरां दे पल्ले ।...

वो ग़म अता किया दिल-ए-दीवाना जल गया ऐसी भी क्या शराब कि पैमाना जल गया...

ये किस पैकर की रंगीनी सिमट कर दिल में आती है मिरी बे-कैफ़ तंहाई को यूँ रंगीं बनाती है ये किस की जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ रुबाब-ए-दिल को छूती है ये किस के पैरहन की सरसराहट गुनगुनाती है...

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मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...