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चंद कलियाँ नशात की चुन कर मुद्दतों महव-ए-यास रहता हूँ तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ...

कहने देती नहीं कुछ मुँह से मोहब्बत मेरी लब पे रह जाती है आ आ के शिकायत मेरी...

बे-नियाज़ी हद से गुज़री बंदा-परवर कब तलक हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमावेंगे क्या...

जब तुझे याद करें कार-ए-जहाँ खेंचता है और फिर इश्क़ वही कोह-ए-गिराँ खेंचता है किसी दुश्मन का कोई तीर न पहुँचा मुझ तक देखना अब के मिरा दोस्त कमाँ खेंचता है...

दिल से तो हर मोआमला कर के चले थे साफ़ हम कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई...

सरशार हूँ सरशार है दुनिया मिरे आगे कौनैन है इक लर्ज़िश-ए-सहबा मिरे आगे हर नज्म है इक आरिज़-ए-रौशन मिरे नज़दीक हर ज़र्रा है इक दीदा-ए-बीना मिरे आगे...

अक़्ल से हासिल हुई क्या क्या पशीमानी मुझे इश्क़ जब देने लगा तालीम-ए-नादानी मुझे रंज देगी बाग़-ए-रिज़वाँ की तन-आसानी मुझे याद आएगा तिरा लुत्फ़-ए-सितम-रानी मुझे...

ओ अँधेरी से अँधेरी रात! आज गम इतना हृदय में, आज तम इतना हृदय में, छिप गया है चाँद-तारों का चमकता गात!...

प्यार किसी को करना लेकिन कह कर उसे बताना क्या अपने को अर्पण करना पर और को अपनाना क्या...

नाम ही क्या निशाँ ही क्या ख़्वाब-ओ-ख़याल हो गए तेरी मिसाल दे के हम तेरी मिसाल हो गए साया-ए-ज़ात से भी रम अक्स-ए-सिफ़ात से भी रम दश्त-ए-ग़ज़ल में आ के देख हम तो ग़ज़ाल हो गए...

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मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...