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राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी लेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानी राजा के मुख में हँसी कण्ठ में माला रानी का अन्तर द्रवित दृगों में पानी...

पूछ उस से कि मक़्बूल है फ़ितरत की गवाही तू साहिब-ए-मंज़िल है कि भटका हुआ राही काफ़िर है मुसलमाँ तो न शाही न फ़क़ीरी मोमिन है तो करता है फ़क़ीरी में भी शाही...

तुम मिरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता...

यक-ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बे-कार बाग़ का याँ जादा भी फ़तीला है लाले के दाग़ का बे-मय किसे है ताक़त-ए-आशोब-ए-आगही खींचा है इज्ज़-ए-हौसला ने ख़त अयाग़ का...

मधुऋतु चंचल, सरिता ध्वनि कल, श्यामल पुलिन ऊर्मि मुख चुंबित, नवल वयस बालाएँ हँस हँस बिखरातीं स्मिति पंखड़ियाँ सित!...

कागज की नावें हैं तैरेंगी तैरेंगी, लेकिन वह डूबेंगी डूबेंगी डूबेंगी॥...

तुम पड़ी हो शान्त सम्मुख स्वप्नदेही दीप्त यमुना बाँसुरी का गीत जैसे पाँखुरी पर पौ फटे की चेतना जैसे क्षितिज पर...

सितम हो जाए तम्हीद-ए-करम ऐसा भी होता है मोहब्बत में बता ऐ ज़ब्त-ए-ग़म ऐसा भी होता है भुला देती हैं सब रंज ओ अलम हैरानियाँ मेरी तिरी तमकीन-ए-बेहद की क़सम ऐसा भी होता है...

किस के लिए कीजिए जामा-ए-दीबा-तलब दिल तो करे है मुदाम दामन-ए-सहरा-तलब काम रवा हों भला उस से हम अब किस तरह उस को तमन्ना नहीं हम हैं तमन्ना-तलब...

ओ गगन के जगमगाते दीप! दीन जीवन के दुलारे खो गये जो स्वप्न सारे, ला सकोगे क्या उन्हें फिर खोज हृदय समीप?...

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मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

दिल जो सीने में ज़ार सा है कुछ ग़म से बे-इख़्तियार सा है कुछ रख़्त-ए-हस्ती बदन पे ठीक नहीं जामा-ए-मुस्तआर सा है कुछ...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...