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जीना अपने ही में एक महान कर्म है जीने का हो सदुपयोग यह मनुज धर्म है...

आज से बारा बरस पहले बड़ा भाई मिरा स्टालिनग्राड की जंगाह में काम आया था मेरी माँ अब भी लिए फिरती है पहलू में ये ग़म जब से अब तक है वही तन पे रिदा-ए-मातम...

वक़्त-ए-ग़ुरूब आज करामात हो गई ज़ुल्फ़ों को उस ने खोल दिया रात हो गई कल तक तो उस में ऐसी करामत न थी कोई वो आँख आज क़िबला-ए-हाजात हो गई...

बाहों में बंधी वह पुलक से पराजित हुई वह चुम्बन-चकित जय में जी उठी वह...

जग के दुख-दैन्य-शयन पर यह रुग्णा जीवन-बाला रे कब से जाग रही, वह आँसू की नीरव माला!...

प्रथम चरण है नए स्वर्ग का, नए स्वर्ग का प्रथम चरण है, नए स्वर्ग का नया चरण है, नया क़दम है!...

रात चाननी मैं टुरां मेरा नाल टुरे परछावां जिन्दे मेरीए । गलीए गलीए चानन सुत्ते...

ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं यक निगह में ग़ुलाम करते हैं देख ख़ूबाँ कूँ वक़्त मिलने के किस अदा सूँ सलाम करते हैं...

पुन्निआं दे चन्न नूं कोई मस्सिआ कीकण अरघ चढ़ाए वे क्यों कोई डाची सागर ख़ातर मारूथल छड्ड जाए वे ।...

लो तीसवां साल भी बीत गया लो बाल रुपहली होने लगे लो कासा-ए-चश्म हुआ ख़ाली लो दिल में नहीं अब दर्द कोई...

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मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...