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उस ने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया मुद्दतों बअ'द मिरी आँखों में आँसू आए...

तमन्ना दर्द-ए-दिल की हो तो कर ख़िदमत फ़क़ीरों की नहीं मिलता ये गौहर बादशाहों के ख़ज़ीनों में...

एजाज़-ए-जाँ-दही है हमारे कलाम को ज़िंदा किया है हम ने मसीहा के नाम को लिक्खो सलाम ग़ैर के ख़त में ग़ुलाम को बंदे का बस सलाम है ऐसे सलाम को...

मैं भी ग्रेजुएट हूँ तुम भी ग्रेजुएट इल्मी मुबाहिसे हों ज़रा पास आ के लेट...

क्या हमने यह दिया, हुए क्यों रूष्ट हमें बतलाओ भी ठहरो, सुन लो बात हमारी, तनक न जाओ, आओ भी रूठ गये तुम नहीं सुनोगे, अच्छा ! अच्छी बात हुई सुहृद, सदय, सज्जन मधुमुख थे मुझको अबतक मिले कई ...

रच फूलों के गीत मनोहर. चित्रित कर लहरों के कम्पन, कविते ! तेरी विभव-पुरी में स्वर्गिक स्वप्न बना कवि-जीवन।...

आदमी के पास सब कुछ है मगर एक तन्हा आदमिय्यत ही नहीं...

और तो पास मिरे हिज्र में क्या रक्खा है इक तिरे दर्द को पहलू में छुपा रक्खा है दिल से अरबाब-ए-वफ़ा का है भुलाना मुश्किल हम ने ये उन के तग़ाफ़ुल को सुना रक्खा है...

तुझ से गरवीदा यक ज़माना रहा कुछ फ़क़त मैं ही मुब्तिला न रहा आप को अब हुई है क़द्र-ए-वफ़ा जब कि मैं लाइक़-ए-जफ़ा न रहा...

हम जो अब आदमी हैं पहले कभी जाम होंगे छलक गए होंगे...

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मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...