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एक तरैया देखी जब पांच ब्राहान न्योते तब अरसराम, परसराम तुलसी, गंगा, सालगराम!...

क्या कहें कुछ कहा नहीं जाता। बिन कहे भी रहा नहीं जाता।1। बे तरह दुख रहा कलेजा है। दर्द अब तो सहा नहीं जाता।2।...

ख़ूब रू ख़ूब काम करते हैं यक निगह में तमाम करते हैं देख ख़ूबाँ कूँ वक्‍त़ मिलने के किस अदा सूँ सलाम करते हैं...

मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से क्या वक़्त इसी का नाम है कि घटनाएँ कुचलती चली जाएँ मस्त हाथी की तरह...

होश आते ही हसीनों को क़यामत आई आँख में फ़ित्नागरी दिल में शरारत आई क्या तसव्वुर है निहायत मुझे हैरत आई आइने में भी नज़र तेरी ही सूरत आई...

मेरे गीत तुम्हारे पास सहारा पाने आएँगे मेरे बाद तुम्हें ये मेरी याद दिलाने आएँगे हौले—हौले पाँव हिलाओ,जल सोया है छेड़ो मत हम सब अपने—अपने दीपक यहीं सिराने आएँगे...

नेता निगाह का कच्चा है नासमझ देश का बच्चा है...

ले लो फूल टटका देव-खग 4की चोंच से : अब भले झुलस मुरझा जाए...

बारिशें फिर ज़मीनों से नाराज़ हैं और समुंदर सभी ख़ुश्क हैं खुरदुरी सख़्त बंजर ज़मीनों में क्या बोइए और क्या काटिए आँख की ओस के चंद क़तरों से क्या इन ज़मीनों को सैराब कर पाओगे...

रंज है हालत-ए-सफ़र हाल-ए-क़याम रंज है सुब्ह-ब-सुब्ह रंज है शाम-ब-शाम रंज है उस की शमीम-ए-ज़ुल्फ़ का कैसे हो शुक्रिया अदा जब कि शमीम रंज है जब कि मशाम रंज है...

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मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...