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बातें रख रख बात बात में बात बनावें। रंग बदल कर नये नये बहुरंग दिखावें। कर चतुराई परम-चतुर नेता कहलावें। मीठे मीठे वचन बोल बहुधा बहलावें।...

गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर होश ओ ख़िरद शिकार कर क़ल्ब ओ नज़र शिकार कर...

मोमिन मैं अपने नालों के सदक़े कि कहते हैं उस को भी आज नींद न आई तमाम शब...

जल्वा अयाँ है क़ुदरत-ए-परवरदिगार का क्या दिल-कुशा ये सीन है फ़स्ल-ए-बहार का नाज़ाँ हैं जोश-ए-हुस्न पे गुल-हा-ए-दिल-फ़रेब जोबन दिखा रहा है ये आलम उभार का...

कुछ मोहतसिबों की ख़ल्वत में कुछ वाइज़ के घर जाती है हम बादा-कशों के हिस्से की अब जाम में कम-तर जाती है यूँ अर्ज़-ओ-तलब से कम ऐ दिल पत्थर दिल पानी होते हैं तुम लाख रज़ा की ख़ू डालो कब ख़ू-ए-सितमगर जाती है...

कुछ दिन से इंतिज़ार-ए-सवाल-ए-दिगर में है वो मुज़्महिल हया जो किसी की नज़र में है सीखी यहीं मिरे दिल-ए-काफ़िर ने बंदगी रब्ब-ए-करीम है तू तिरी रहगुज़र में है...

किस लिए कम नहीं है दर्द-ए-फ़िराक़ अब तो वो ध्यान से उतर भी गए...

पूछता हूँ मैं तुझे दिनकर! कि तू क्या कर रहा है? राजनगरी में पड़ा क्यो दिन गँवाता है? दौड़ता फिरता समूचे देश में किस फेर में तू? छाँह में अब भी नहीं क्यों बैठ जाता है?...

जुरअत-ए-शौक़ तो क्या कुछ नहीं कहती लेकिन पाँव फैलाने नहीं देती है चादर मुझ को...

क्या तुम को ये पता है ऐ ना-समझ रफ़ीक़ो रोज़-ए-अज़ल से जिस पर तुम गामज़न रहे हो...

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मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...