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पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा, धरती पर, शायद, शेष बची है नहीं घास; उड़ गया भाप बनकर सरिताओं का पानी, बाकी न सितारे बचे चाँद के आस-पास ।...

मति मान-सरोवर मंजुल मराल। संभावित समुदाय सभासद वृन्द। भाव कमनीय कंज परम प्रेमिक। नव नव रस लुब्धा भावुक मिलिन्द।1।...

मयूरका के साहिलों पे किस क़दर गुलाब थे कि ख़ुशबुएँ थी बे-तरह कि रंग बे-हिसाब थे तुनुक-लिबासियाँ शनावरों की थीं क़यामतें तमाम सीम-तन शरीक-ए-जश्न-ए-शहर-ए-आब थे...

जिस से ये तबीअत बड़ी मुश्किल से लगी थी देखा तो वो तस्वीर हर इक दिल से लगी थी...

जमेगी कैसे बिसात-ए-याराँ कि शीशा ओ जाम बुझ गए हैं सजेगी कैसे शब-ए-निगाराँ कि दिल सर-ए-शाम बुझ गए हैं वो तीरगी है रह-ए-बुताँ में चराग़-ए-रुख़ है न शम-ए-वादा किरन कोई आरज़ू की लाओ कि सब दर-ओ-बाम बुझ गए हैं...

ये 'मीर'-ए-सितम-कुश्ता किसू वक़्त जवाँ था अंदाज़-ए-सुख़न का सबब शोर ओ फ़ुग़ाँ था जादू की पुड़ी पर्चा-ए-अबयात था उस का मुँह तकिए ग़ज़ल पढ़ते अजब सेहर-बयाँ था...

नयन नहाये जब से उसकी छबि में रूप बहाये। साथ छुटा स्वजनों की, पाँख फिर गई,...

परमात्मा ने आत्मा बख़्शी है श्रीमान करे आत्महत्या उसे समझो मूर्ख महान समझो मूर्ख महान बुरे दिन वापस जाएँ अटल नियम है दु:ख के बाद सुखानन्द आएँ ...

तुम मेरी एक निजी घड़ी जिस में मैं ओक भर-भर समय पूरता हूँ और वह बालू हो कर रीत जाता है।...

आप के दुश्मन रहें वक़्फ़-ए-ख़लिश सर्फ़-ए-तपिश आप क्यूँ ग़म-ख़्वारी-ए-बीमार-ए-हिज्राँ कीजिए...

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मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

दिल जो सीने में ज़ार सा है कुछ ग़म से बे-इख़्तियार सा है कुछ रख़्त-ए-हस्ती बदन पे ठीक नहीं जामा-ए-मुस्तआर सा है कुछ...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...