Discover Poetry

ना निरापद कोई नहीं है न तुम, न मैं, न वे न वे, न मैं, न तुम सबके पीछे बंधी है दुम आसक्ति की!...

दुल्हन बनी हुई हैं राहें जश्न मनाओ साल-ए-नौ के...

असीरान-ए-क़फ़स सेहन-ए-चमन को याद करते हैं भला बुलबुल पे यूँ भी ज़ुल्म ऐ सय्याद करते हैं कमर का तेरे जिस दम नक़्श हम ईजाद करते हैं तो जाँ फ़रमान आ कर मअ'नी ओ बहज़ाद करते हैं...

मौन-मिटा वाक्-चपल लोग हुए, भीतर से बोले...

तुम भी कुछ हो लेकिन जो हो, वह कलियों में रूप-गन्ध की लगी गांठ है...

क्यों पूछ-पूछ जाती है तारक-नयनों की झपकी- क्या अभी अलक्षित ही हैं किरणें तेरे दीपक की? इस जीवन के सागर में मेरा रस-बिन्दु कहाँ है? सब ओर चाँदनी छिटकी-मेरी ही इन्दु कहाँ है?...

उदासी भी एक पक्का रंग है जीवन का उदासी के भी तमाम रंग होते हैं जैसे...

दोस्तो क्या क्या दिवाली में नशात-ओ-ऐश है सब मुहय्या है जो इस हंगाम के शायाँ है शय...

कोई रोता दूर कहीं पर! इन काली घड़ियों के अंदर, यत्न बचाने के निष्फल कर, काल प्रबल ने किसके जीवन का प्यारा अवलम्ब लिया हर?...

तपने के बाद वे भट्टे की समाधि से निकलीं और एक वास्तुविद के स्वप्न में विलीन हो गयीं घर एक ईंटों भरी अवधारणा है ...

Recent Updates

मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

दिल जो सीने में ज़ार सा है कुछ ग़म से बे-इख़्तियार सा है कुछ रख़्त-ए-हस्ती बदन पे ठीक नहीं जामा-ए-मुस्तआर सा है कुछ...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...