Discover Poetry

जज़्बात भी हिन्दू होते हैं चाहत भी मुसलमाँ होती है दुनिया का इशारा था लेकिन समझा न इशारा दिल ही तो है...

हुआ जब सामना उस ख़ूब-रू से उड़ा है रंग गुल का पहले बू से ये आँखें तर जो रहती हैं लहू से वो गुज़रे इश्क़ के दिन आबरू से...

रंज खींचे थे दाग़ खाए थे दिल ने सदमे बड़े उठाए थे पास-ए-नामूस-ए-इश्क़ था वर्ना कितने आँसू पलक तक आए थे...

लाया है मिरा शौक़ मुझे पर्दे से बाहर मैं वर्ना वही ख़ल्वती-ए-राज़-ए-निहाँ हूँ...

जेठ नहीं, यह जलन हृदय की, उठकर जरा देख तो ले; जगती में सावन आया है, मायाविन! सपने धो ले।...

किरण अब मुझ पर झरी मैंने कहा : मैं वज्र कठोर हूँ- पत्थर सनातन ।...

कदी आ मिल यार प्यारिआ । तेरियां वाटां तों सिर वारिआ । चढ़ बागीं कोइल कूकदी, नित सोज़-इ-अलम दे फूकदी,...

बदला ले लो, सुख की घड़ियों! सौ-सौ तीखे काँटे आये फिर-फिर चुभने तन में मेरे! था ज्ञात मुझे यह होना है क्षण भंगुर स्वप्निल फुलझड़ियों!...

मैं जीवन में कुछ न कर सका! जग में अँधियारा छाया था, मैं ज्‍वाला लेकर आया था मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका!...

चारागर भी जो यूँ गुज़र जाएँ फिर ये बीमार किस के घर जाएँ आज का ग़म बड़ी क़यामत है आज सब नक़्श-ए-ग़म उभर जाएँ...

Recent Updates

मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...