Discover Poetry

जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं कैसे नादान हैं शोलों को हवा देते हैं हम से दीवाने कहीं तर्क-ए-वफ़ा करते हैं जान जाए कि रहे बात निभा लेते हैं...

बहुत रोया हूँ मैं जब से ये मैं ने ख़्वाब देखा है कि आप आँसू बहाते सामने दुश्मन के बैठे हैं...

जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई...

काबे में जाँ-ब-लब थे हम दूरी-ए-बुताँ से आए हैं फिर के यारो अब के ख़ुदा के हाँ से तस्वीर के से ताइर ख़ामोश रहते हैं हम जी कुछ उचट गया है अब नाला ओ फ़ुग़ाँ से...

नाच रहे पहले के वही वही मोर; नाच रहे पहले के वही वही भालू।...

उस गुलवदनी को पाकर भी पा न सकोगे उसका प्यार, जब तक क्रूर विरह का कंटक सखे, न कर देगा उर पार!...

मानस-मरु में व्यथा-स्रोत स्मृतियाँ ला भर-भर देता था, वर्तमान के सूनेपन को भूत द्रवित कर देता था, वातावलियों से ताडि़त हो लहरें भटकी फिरती थीं- कवि के विस्तृत हृदय-क्षेत्र में नित्य हिलोरें करती थीं।...

गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुतेरा पड़ा है। सख्त पंजा, नस कसी चौड़ी कलाई और बल्लेदार बाहें, और आँखें लाल चिंगारी सरीखी,...

तूं जदों मैनूं मिली सैं पहली वार तूं केहा सी लाडली जही चपत मार मैं तेरे तों बहुत ही हां शरमसार कीह करां विधवा हां मैं मज़बूर हां ।...

ज़ंजीरों में जकड़े हुए क़ैदी की सूरत रेग के सैल में एक बगूला हाँप रहा है अपने वजूद से ख़ौफ़-ज़दा है...

Recent Updates

मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...