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टूटने का सुख: बहुत प्यारे बन्धनों को आज झटका लग रहा है, टूट जायेंगे कि मुझ को आज खटका लग रहा है, आज आशाएं कभी भी चूर होने जा रही हैं,...

हठीले मेरे भोले पथिक! किधर जाते हो आकस्मात। अरे क्षण भर रुक जाओ यहाँ, सोच तो लो आगे की बात॥...

कमाल-ए-जोश-ए-जुनूँ में रहा मैं गर्म-ए-तवाफ़ ख़ुदा का शुक्र सलामत रहा हरम का ग़िलाफ़ ये इत्तिफ़ाक़ मुबारक हो मोमिनों के लिए कि यक ज़बाँ हैं फ़क़ीहान-ए-शहर मेरे ख़िलाफ़...

भारत का सिर आज इसी सरहिन्द मे गौरव-मंडित ऊँचा होना चाहता अरूण उदय होकर देता है कुछ पता करूण प्रलाप करेगा भैरव घोषणा...

शरद के रजत नील अंचल में पीले गुलाबों का सूर्यास्‍त...

एक अहंकार है जिस में मैं रहता हूँ जिस में (और जिसे!) मैं कहता हूँ कि यह मेरा अनुभव है जो मेरा है, मेरा भोगा है, मेरा जिया है :...

मेरी बर्बादियाँ दुरुस्त मगर तू बता क्या तुझे सवाब हुआ...

कल्ल्ह जदों उहनूं मिल के मैं घर आ रेहा सी तां मेरी जेब विच चन्न दा ही इह खोटा रुपईआ रह ग्या सी...

तुम्हारे जिस्म का सूरज जहाँ जहाँ टूटा वहीं वहीं मिरी ज़ंजीर-ए-जाँ भी टूटी है...

इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ सुन रहा हूँ कि घिर गया हूँ मैं...

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मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...