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माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी? भय है, सुन कर हँस दोगे मेरी नादानी परदेशी! सृजन-बीच संहार छिपा, कैसे बतलाऊं परदेशी? सरल कंठ से विषम राग मैं कैसे गाऊँ परदेशी?...
हैफ़ जिस पे कि हम तैयार थे मर जाने को, यकायक हमसे छुड़ाया उसी काशाने को। आसमां क्या यहां बाक़ी था ग़ज़ब ढाने को? क्या कोई और बहाना न था तरसाने को?...
ये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं हैं लाखों रोग ज़माने में क्यूँ इश्क़ है रुस्वा बे-चारा हैं और भी वजहें वहशत की इंसान को रखतीं दुखियारा...
अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो मुझ से बिखरे हुए गेसू नहीं देखे जाते सुर्ख़ आँखों की क़सम काँपती पलकों की क़सम थरथराते हुए आँसू नहीं देखे जाते...
चट जग जाता हूँ, चिराग को जलाता हूँ, हो सजग तुम्हें मैं देख पाता हूँ कि पैठे हो; पास नहीं आते, हो पुकार मचवाते, तकसीर बतलाओ क्यों यों बदन उमैठे हो?...
कटक संवार शत्रु देश पर चढ़ा, घमंड, घोर शोर से भरा बढ़ा, स्वतंत्र देश, उठ इसे सबक सिखा, बहुत हुई न देर अब लगा जरा।...
तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा, नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे भट्ठी वालीए । भट्ठी वालीए चम्बे दीए डालीए...
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हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...
गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...
हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...
फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...
हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...
है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...
उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...
गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...
चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...