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इस शहर के बादल तिरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैं ये आग लगाते हैं बुझाने नहीं आते...

उस शाम वो रुख़्सत का समाँ याद रहेगा वो शहर वो कूचा वो मकाँ याद रहेगा वो टीस कि उभरी थी इधर याद रहेगी वो दर्द कि उट्ठा था यहाँ याद रहेगा...

क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में...

ऐसी तारीकियाँ आँखों में बसी हैं कि 'फ़राज़' रात तो रात है हम दिन को जलाते हैं चराग़...

इस वक़्त तो यूँ लगता है अब कुछ भी नहीं है महताब न सूरज, न अँधेरा न सवेरा आँखों के दरीचों पे किसी हुस्न की चिलमन और दिल की पनाहों में किसी दर्द का डेरा...

अभी तक कर पाई न सिंगार रास की मुरली उठी पुकार। गई सहसा किस रस से भींग वकुल-वन में कोकिल की तान?...

क्यों यह मेरी ज़िन्दगी फूटे हुए पीपे के तेल-सी बूँद-बूँद अनदेखी चुई काल की मिट्टी में रच गयी?...

जो न बन पाई तुम्हारे गीत की कोमल कड़ी। तो मधुर मधुमास का वरदान क्या है? तो अमर अस्तित्व का अभिमान क्या है?...

अपना सा शौक़ औरों में लाएँ कहाँ से हम घबरा गए हैं बे-दिली-ए-हमरहाँ से हम कुछ ऐसी दूर भी तो नहीं मंज़िल-ए-मुराद लेकिन ये जब कि छूट चलें कारवाँ से हम...

हालत-ए-हाल के सबब हालत-ए-हाल ही गई शौक़ में कुछ नहीं गया शौक़ की ज़िंदगी गई तेरा फ़िराक़ जान-ए-जाँ ऐश था क्या मिरे लिए यानी तिरे फ़िराक़ में ख़ूब शराब पी गई...

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मिली है दुख़्तर-ए-रज़ लड़-झगड़ के क़ाज़ी से जिहाद कर के जो औरत मिले हराम नहीं...

हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...

हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...

हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...

है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...

गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...

चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...