यह अनुचित माँग तुम्हारी है
यह अनुचित माँग तुम्हारी है! रोएँ-रोएँ तन छिद्रित कर कहते हो, जीवन में रस भर! हँस लो असफलता पर मेरी, पर यह मेरी लाचारी है। यह अनुचित माँग तुम्हारी है! कोना-कोना दुख से उर भर, कहते हो, खोल सुखों के स्वर! मानव की परवशता के प्रति यह व्यंग तुम्हारा भारी है। यह अनुचित माँग तुम्हारी है! समकक्षी से परिहास भला, जो ले बदला, जो दे बदला, मैं न्याय चाहता हूँ केवल जिसका मानव अधिकारी है। यह अनुचित माँग तुम्हारी है!

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