विरह व्यथित मन, साक़ी, तत्क्षण अधरामृत पी होता विस्मृत, कलुषित अंतर रति से घुल कर बनता पूत, सुरा समाधि स्थित! शोक द्रवित होता आनंदित मादक मदिराधर कर चुंबित, उसे न सुख दुख, वह नित हँसमुख, स्वर्ग फूल सा भू पर लुंठित!