था अबस तर्क-ए-तअल्लुक़ का इरादा यूँ भी इश्क़ ज़िंदा नहीं रहता है ज़ियादा यूँ भी इक तो इन आँखों में नश्शा था बला का उस पर हम को मर्ग़ूब है कैफ़ियत-ए-बादा यूँ भी नामा-बर उस से न अहवाल हमारा कहना वो तुनुक-ख़ू है बिगड़ जाए मबादा यूँ भी सो गए हम भी कि बे-कार था रस्ता तकना उस को आना ही नहीं था शब-ए-वादा यूँ भी कुछ तो वो हुस्न पशीमाँ है जफ़ा पर अपनी और कुछ उस के लिए दिल था कुशादा यूँ भी कूच कर जाते हैं हम कू-ए-मोहब्बत से 'फ़राज़' इन दिनों चाक-ए-गिरेबाँ हैं ज़ियादा यूँ भी