घायल हिन्दुस्तान
मुझको है विश्वास किसी दिन घायल हिंदुस्तान उठेगा। दबी हुई दुबकी बैठी हैं कलरवकारी चार दिशाएँ, ठगी हुई, ठिठकी-सी लगतीं नभ की चिर गतिमान हवाएँ, अंबर के आनन के ऊपर एक मुर्दनी-सी छाई है, एक उदासी में डूबी हैं तृण-तरुवर-पल्लव-लतिकाएँ; आंधी के पहले देखा है कभी प्रकृति का निश्चल चेहरा? इस निश्चलता के अंदर से ही भीषण तूफान उठेगा। मुझको है विश्वास किसी दिन घायल हिंदुस्तान उठेगा।

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