Ayodhya Singh Upadhyay
Hari Oudh
( 1865 - 1947 )

Ayodhya Prasad Singh Upadhyay ‘Hari Oudh' (Hindi: अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध’) was a writer of Hindi literature. He has been the Chairman of the Hindi Sahitya Sammelan and had been conferred the title of Vidyavachaspati - ‘विद्यावाचस्पति’. More

काली-काली कू-कू करती जो है डाली-डाली फिरती! कुछ अपनी हीं धुन में ऐंठी छिपी हरे पत्तों में बैठी...

श्याम रंग में तो न रँगे हो जो अन्तर रखते हो श्याम। तो जलधार हो नहीं विरह-दव में जो जल जल जीवें बाम। जीवनप्रद हो तभी करो जो तुम चातक को जीवन दान। कैसे सरस कहें हम तुमको ऊसर हुआ न जो रसवान।1।...

उमगती हँसती आती हूँ। अनूठा गजरा लाती हूँ। भरा आँखों में हो आँसू मगर मोती बरसाती हूँ।1। बाल हों बुरी तरह फैले।...

चाल चल चल कर के कितनी। मैं नहीं माल मूसता हूँ। घिनाये क्यों मुझसे कोई। मैं नहीं लहू चूसता हूँ।1।...

बाल को साँप समझते हैं। तनी भौंहों को तलवारें। तीर कहते हैं आँखों को। भले ही वे उनको मारें।1।...

जब लगा तार तार ही टूटा। और झनकार फूट कर रोई। जब कि बोली न बोल की तूती। किसलिए बीन तब बजी कोई।1।...

है जिन्हें तोड़ना भले ही वे। तोड़ लें आसमान के तारे। ये फबीले इधर उधर फैले। फूल ही हैं हमें बहुत प्यारे।1।...

श्याम घन में है किसकी झलक। कौन रहता है रस से भरा। लुभा लेती है धरती किसे। दुपट्टा ओढ़ ओढ़ कर हरा।1।...

चाँद के हँसने में किसकी। कला है बहुत लुभा पाती। चैत की खिली चाँदनी में। चमक किसकी है दिखलाती।1।...

आज क्यों भोर है बहुत भाता। क्यों खिली आसमान की लाली। किस लिए है निकल रहा सूरज। साथ रोली भरी लिये थाली।1।...