Page 3 of 11

मैं मधुबाला मधुशाला की, मैं मधुशाला की मधुबाला! मैं मधु-विक्रेता को प्यारी, मधु के धट मुझ पर बलिहारी,...

(१) वह व्यक्ति रचा, जो लेट गया मधुबाला की गोदी में सिर धरकर अपना,...

क्या आज तुम्हारे आँगन में भी घन छाए? पीला, गर्दीला पच्छिम का आकाश हुआ, आया झोंका, तूफ़ान जिधर जी करता है मुड़ पड़ते हैं,...

जीवन का दिन बीत चुका था, छाई थी जीवन की रात, किंतु नहीं मैंने छोड़ी थी आशा-होगा पुनः प्रभात।...

गाता विश्व व्याकुल राग। है स्वरों का मेल छूटा, नाद उखड़ा, ताल टूटा, लो, रुदन का कंठ फूटा,...

नगाधिराज श्रृंग पर खड़ी हुई, समुद्र की तरंग पर अड़ी हुई, स्वदेश में सभी जगह गड़ी हुई अटल ध्वजा हरी, सफेद केसरी।...

चढ़ न पाया सीढ़ियों पर! प्रात आया, भक्त आए, पुष्प-जल की भेंट लाए, देव-मंदिर पहुँच पाए,...

उनके पास घर-बार है, कार है, कारबार है,, सुखी परिवार है, घर में सुविधाएँ हैं,...

गिरि शिखर, गिरि शिखर, गिरि शिखर! जबकि ध्येय बन चुका, जबकि उठ चरण चुका, स्वर्ग भी समीप देख--मत ठहर, मत ठहर, मत ठहर!...

आज ही आना तुम्हें था? आज मैं पहले पहल कुछ घूँट मधु पीने चला था, पास मेरे आज ही क्यों विश्व आ जाना तुम्हें था।...

यातना जीवन की भारी! चेतनता पहनाई जाती जड़ता का परिधान, देव और पशु में छिड़ जाता है संघर्ष महान!...

जा रही है यह लहर भी! चार दिन उर से लगाया, साथ में रोई, रुलाया, पर बदलती जा रही है आज तो इसकी नजर भी!...

बीन, आ छेडूँ तुझे, मन में उदासी छा रही है। लग रहा जैसे कि मुझसे है सकल संसार रूठा, लग रहा जैसे कि सबकी...

तुम्हारे नील झील-से नैन, नीर निर्झर-से लहरे केश। तुम्हारे तन का रेखाकार वही कमनीय, कलामय हाथ...

सुमुखि, कभी क्या मेरे जीवन के भी ऐसे दिन आएँगे? जैसे इस गिरि की गोदी में एक बसा है नगर निराला, घर, छप्पर, छत, बाग-बगीचों,...

हम ऐसे आज़ाद, हमारा झंडा है बादल! चांदी, सोने, हीरे, मोती से सजतीं गुड़ियाँ,...

मैं समय बर्बाद करता? प्रायशः हित-मित्र मेरे पास आ संध्या-सबेरे, हो परम गंभीर कहते--मैं समय बर्बाद करता।...

साथी, साथ न देगा दुख भी! काल छीनने दु:ख आता है, जब दु:ख भी प्रिय हो जाता है, नहीं चाहते जब हम दु:ख के बदले चिर सुख भी!...

यह मानव की अग्नि-परीक्षा। बढ़ती हैं लपटें भयकारी अगणित अग्नि-सर्प-सी बन-बन, गरुड़ व्यूह से धँसकर इनमें...

जो बीत गई सो बात गई! जीवन में एक सितारा था, माना, वह बेहद प्‍यारा था, वह डूब गया तो डूब गया;...

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१। ...

हूँ जैसा तुमने कर डाला! पूण्य किया, पापों में डूबा, सुख से ऊबा, दुख से ऊबा, हमसे यह सब करा तुम्हीं ने अपना कोई अर्थ निकाला!...

साँस चलती है तुझे चलना पड़ेगा ही मुसाफिर! चल रहा है तारकों का दल गगन में गीत गाता,...

सुमति स्वदेश छोड़कर चली गई, ब्रिटेन-कूटनीति से छलि गई, अमीत, मीत; मीत, शत्रु-सा लगा, अखंड देश खंड-खंड हो गया।...

अब निशा देती निमंत्रण! महल इसका तम-विनिर्मित, ज्वलित इसमें दीप अगणित! द्वार निद्रा के सजे हैं स्वप्न से शोभन-अशोभन!...

करुण पुकार! करुण पुकार! मानवता करती उद्भूत कैसे दानवता के पूत, जो पिशाचपन को अपनाकर...

जीवन का यह पृष्ठ पलट, मन। इसपर जो थी लिखी कहानी, वह अब तुझको याद जबानी, बारबार पढ़कर क्यों इसको व्यर्थ गँवाता जीवन के क्षण।...

आओ, सो जाएँ, मर जाएँ! स्वप्न-लोक से हम निर्वासित, कब से गृह सुख को लालायित, आओ, निद्रा पथ से छिपकर हम अपने घर जाएँ!...

देख, रात है काली कितनी! आज सितारे भी हैं सोए, बादल की चादर में खोए, एक बार भी नहीं उठाती घूँघट घन-अवगुंठन वाली!...

हम कब अपनी बात छिपाते? हम अपना जीवन अंकित कर फेंक चुके हैं राज मार्ग पर, जिसके जी में आए पढ़ले थमकर पलभर आते जाते!...

दीपक पर परवाने आए! अपने पर फड़काते आए, किरणों पर बलखाते आए, बड़ी-बड़ी इच्छाएँ लाए, बड़ी-बड़ी आशाएँ लाए!...

सहर्ष स्वर्ग घंटियाँ बजा रहा, कलश सजा रहा, ध्वजा उठा रहा, समस्त देवता उछाह में सजे, तड़क रही कहीं गुलाम-हथकड़ी।...

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था। स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था...

देवों ने था जिसे बनाया, देवों ने था जिसे बजाया, मानव के हाथों में कैसे इसको आज समर्पित कर दूँ? किस कर में यह वीणा धर दूँ?...

गिरजे से घंटे की टन-टन! मंदिर से शंखों की तानें, मस्जिद से पाबंद अजानें उठ कर नित्य किया करती हैं अपने भक्तों का आवाहन!...

बीत चली संध्‍या की वेला! धुंधली प्रति पल पड़नेवाली एक रेख में सिमटी लाली कहती है, समाप्‍त होता है सतरंगे बादल का मेला!...

छोड़ मैं आया वहाँ मुस्कान! स्वार्थ का जिसमें न था कण, ध्येय था जिसका समर्पण, जिस जगह ऐसे प्रणय का था हुआ अपमान!...

दुखी-मन से कुछ भी न कहो! व्यर्थ उसे है ज्ञान सिखाना, व्यर्थ उसे दर्शन समझाना, उसके दुख से दुखी नहीं हो तो बस दूर रहो!...

दुर्दशा मिट्टी की होती! कर आशा, विचार, स्वप्नों से, भावों से श्रृंगार, देख निमिष भर लेता कोई सब श्रृंगार उतार!...

जय हो, हे संसार, तम्हारी! जहाँ झुके हम वहाँ तनो तुम, जहाँ मिटे हम वहाँ बनो तुम, तुम जीतो उस ठौर जहाँ पर हमने बाज़ी हारी!...