देस-विभाजन-१
सुमति स्वदेश छोड़कर चली गई, ब्रिटेन-कूटनीति से छलि गई, अमीत, मीत; मीत, शत्रु-सा लगा, अखंड देश खंड-खंड हो गया। स्वतंत्रता प्रभात क्या यही-यही! कि रक्त से उषा भिगो रही मही, कि त्राहि-त्राहि शब्द से गगन जगा, जगी घृणा ममत्व-प्रेम सो गया। अजान आज बंधु-बंधु के लिए, पड़ोस-का, विदेश पर नज़र किए, रहें न खड्ग-हस्त किस प्रकार हम, विदेश है हमें चुनौतियां दिए, दुरंत युद्ध बीज आज बो गया।

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