दुखी मन से कुछ भी न कहो
दुखी-मन से कुछ भी न कहो! व्यर्थ उसे है ज्ञान सिखाना, व्यर्थ उसे दर्शन समझाना, उसके दुख से दुखी नहीं हो तो बस दूर रहो! दुखी-मन से कुछ भी न कहो! उसके नयनों का जल खारा, है गंगा की निर्मल धारा, पावन कर देगी तन-मन को क्षण भर साथ बहो! दुखी-मन से कुछ भी न कहो! देन बड़ी सबसे यह विधि की, है समता इससे किस निधि की? दुखी दुखी को कहो, भूल कर उसे न दीन कहो? दुखी-मन से कुछ भी न कहो!

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