करुण पुकार
करुण पुकार! करुण पुकार! मानवता करती उद्भूत कैसे दानवता के पूत, जो पिशाचपन को अपनाकर बनते महानाश के दूत, जिनके पग से कुचला जाकर जग-जीवन करत चीत्कार। करुण पुकार! करुण पुकार! मानव हो व्यक्तित्व विहीन, जड़, निर्मम, निर्बुद्धि मशीन, आततायियों के इंगित पर करता नंगा नाच नवीन, युग-युग की सभ्यता देख यह कर उठती है हाहाकार। करुण पुकार! करुण पुकार! कारागारों का प्राचीर बंदी करता कभी शरीर चोर, डाकुओं, हत्यारों का; आज जालिमों की जंजीर में जकड़े आदर्श सड़ रहे, घुटते हैं उत्कृष्ट विचार। करुण पुकार! करुण पुकार!

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