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अब देखिए न मेरी कारगुज़ारी कि मैं मँगनी के घोड़े पर सवारी कर ठाकुर साहब के लिए उन की रियाया से लगान...
देखि-देखि जिय अचरज होई यह पद बूझें बिरला कोई॥ धरती उलटि अकासै जाय, चिउंटी के मुख हस्ति समाय। बिना पवन सो पर्वत उड़े, जीव जन्तु सब वृक्षा चढ़े। सूखे सरवर उठे हिलोरा, बिनु जल चकवा करत किलोरा। ...
मेरी नाकाम मोहब्बत की कहानी मत छेड़ अपनी मायूस उमंगों का फ़साना न सुना ज़िंदगी तल्ख़ सही ज़हर सही सम ही सही दर्द ओ आज़ार सही जब्र सही ग़म ही सही...
वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ वो शब-ओ-रोज़ ओ माह-ओ-साल कहाँ फ़ुर्सत-ए-कारोबार-ए-शौक़ किसे ज़ौक़-ए-नज़्ज़ारा-ए-जमाल कहाँ...
अलस्सबाह कि थी काएनात सर-ब-सुजूद फ़लक पे शोर-ए-अज़ाँ था ज़मीं पे बाँग-ए-दुरूद बहार शबनम-आसूदा थी कि रूह-ए-ख़लील फ़रोग़-ए-लाला-ओ-गुल था कि आतिश-ए-नमरूद...
सफल राजनीतिज्ञ वह जो जन गण में व्याप्त। जिस पद को वह पकड़ ले कभी न होय समाप्त॥ कभी न होय समाप्त, घुमाए पहिया ऐसा। पैसा से पद मिले, मिले फिर पद से पैसा॥...
वे दिन भला किया जो भूले। दृग-जल-जमुना बढ़ी किन्तु श्यामल वे चरण न पाये, कोटि-तरंग-बाँह के पंथी, तट-मूर्च्छित फिर आये, अब न अमित! विभ्रम दे, चल--...
हवा चले वरक़-ए-आरज़ू पलट जाए तुलू हो कोई चेहरा तो धुँद छट जाए यही है वक़्त कि ख़्वाबों के बादबाँ खोलो कहीं न फिर से नदी आँसुओं की घट जाए...
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हम-सर-ए-ज़ुल्फ़ क़द-ए-हूर-ए-शिमाइल ठहरा लाम का ख़ूब अलिफ़ मद्द-ए-मुक़ाबिल ठहरा दीदा-ए-तर से जो दामन में गिरा दिल ठहरा बहते बहते ये सफ़ीना लब-ए-साहिल ठहरा...
गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी कि है ये तूल क़िस्सा रात थोड़ी जो मय ज़ाहिद ने माँगी मस्त बोले बहुत या क़िबला-ए-हाजात थोड़ी...
हैं न ज़िंदों में न मुर्दों में कमर के आशिक़ न इधर के हैं इलाही न उधर के आशिक़ है वही आँख जो मुश्ताक़ तिरे दीद की हो कान वो हैं जो रहें तेरी ख़बर के आशिक़...
फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा...
हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़ लोग नाहक़ ख़राब होते हैं...
है ख़मोशी ज़ुल्म-ए-चर्ख़-ए-देव-पैकर का जवाब आदमी होता तो हम देते बराबर का जवाब जो बगूला दश्त-ए-ग़ुर्बत में उठा समझा ये मैं करती है तामीर दीवानी मिरे घर का जवाब...
उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ...
गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभी ये शहर था ऐसा कि बंद राहें थीं...
चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़...