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है वहाँ शान-ए-तग़ाफ़ुल को जफ़ा से भी गुरेज़ इल्तिफ़ात-ए-निगह-ए-यार कहाँ से लाऊँ...

निगाह-ए-यार जिसे आश्ना-ए-राज़ करे वो अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे क्यूँ न नाज़ करे दिलों को फ़िक्र-ए-दो-आलम से कर दिया आज़ाद तिरे जुनूँ का ख़ुदा सिलसिला दराज़ करे...

रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम दहका हुआ है आतिश-ए-गुल से चमन तमाम हैरत ग़ुरूर-ए-हुस्न से शोख़ी से इज़्तिराब दिल ने भी तेरे सीख लिए हैं चलन तमाम...

देखने आए थे वो अपनी मोहब्बत का असर कहने को ये है कि आए हैं अयादत कर के...

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है...

मुझ से तन्हाई में गर मिलिए तो दीजे गालियाँ और बज़्म-ए-ग़ैर में जान-ए-हया हो जाइए...

कट गई एहतियात-ए-इश्क़ में उम्र हम से इज़हार-ए-मुद्दआ न हुआ...

मुदावा-ए-दिल-ए-दीवाना करते ये करते हम तो कुछ अच्छा न करते वफ़ा सादिक़ अगर होती हमारी वो करते भी तो जौर इतना न करते...

हर हाल में रहा जो तिरा आसरा मुझे मायूस कर सका न हुजूम-ए-बला मुझे हर नग़्मे ने उन्हीं की तलब का दिया पयाम हर साज़ ने उन्हीं की सुनाई सदा मुझे...

दिल को ख़याल-ए-यार ने मख़्मूर कर दिया साग़र को रंग-ए-बादा ने पुर-नूर कर दिया...

कोशिशें हम ने कीं हज़ार मगर इश्क़ में एक मो'तबर न हुई...

सितम हो जाए तम्हीद-ए-करम ऐसा भी होता है मोहब्बत में बता ऐ ज़ब्त-ए-ग़म ऐसा भी होता है भुला देती हैं सब रंज ओ अलम हैरानियाँ मेरी तिरी तमकीन-ए-बेहद की क़सम ऐसा भी होता है...

और तो पास मिरे हिज्र में क्या रक्खा है इक तिरे दर्द को पहलू में छुपा रक्खा है दिल से अरबाब-ए-वफ़ा का है भुलाना मुश्किल हम ने ये उन के तग़ाफ़ुल को सुना रक्खा है...

अपना सा शौक़ औरों में लाएँ कहाँ से हम घबरा गए हैं बे-दिली-ए-हमरहाँ से हम कुछ ऐसी दूर भी तो नहीं मंज़िल-ए-मुराद लेकिन ये जब कि छूट चलें कारवाँ से हम...

देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना शेवा-ए-इश्क़ नहीं हुस्न को रुस्वा करना इक नज़र भी तिरी काफ़ी थी प-ए-राहत-ए-जाँ कुछ भी दुश्वार न था मुझ को शकेबा करना...

यूँ तो आशिक़ तिरा ज़माना हुआ मुझ सा जाँ-बाज़ दूसरा न हुआ ख़ुद-ब-ख़ुद बू-ए-यार फैल गई कोई मिन्नत-ए-कश-ए-सबा न हुआ...

ख़ू समझ में नहीं आती तिरे दीवानों की दामनों की न ख़बर है न गिरेबानों की जल्वा-ए-साग़र-ओ-मीना है जो हमरंग-ए-बहार रौनक़ें तुर्फ़ा तरक़्क़ी पे हैं मय-ख़ानों की...

न सूरत कहीं शादमानी की देखी बहुत सैर दुनिया-ए-फ़ानी की देखी मिरी चश्म-ए-ख़ूँ-बार में ख़ूब रह कर बहार आप ने गुल-फ़िशानी की देखी...

पैहम दिया प्याला-ए-मय बरमला दिया साक़ी ने इल्तिफ़ात का दरिया बहा दिया उस हीला-जू ने वस्ल की शब हम से रूठ कर नैरंग-ए-रोज़गार का आलम दिखा दिया...

है मश्क़-ए-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी इक तुर्फ़ा तमाशा है 'हसरत' की तबीअत भी जो चाहो सज़ा दे लो तुम और भी खुल खेलो पर हम से क़सम ले लो की हो जो शिकायत भी...

छेड़ नाहक़ न ऐ नसीम-ए-बहार सैर-ए-गुल का यहाँ किसे है दिमाग़...

न समझे दिल फ़रेब-ए-आरज़ू को न हम छोड़ें तुम्हारी जुस्तुजू को तिरी तलवार से ऐ शाह-ए-ख़ूबाँ मोहब्बत हो गई है हर गुलू को...

दर्द-ए-दिल की उन्हें ख़बर न हुई कोई तदबीर कारगर न हुई कोशिशें हम ने कीं हज़ार मगर इश्क़ में एक मो'तबर न हुई...

सियहकार थे बा-सफ़ा हो गए हम तिरे इश्क़ में क्या से क्या हो गए हम न जाना कि शौक़ और भड़केगा मेरा वो समझे कि उस से जुदा हो गए हम...

ख़ंदा-ए-अहल-ए-जहाँ की मुझे पर्वा क्या है तुम भी हँसते हो मिरे हाल पे रोना है यही...

दावा-ए-आशिक़ी है तो 'हसरत' करो निबाह ये क्या के इब्तिदा ही में घबरा के रह गए...

मथुरा कि नगर है आशिक़ी का दम भरती है आरज़ू इसी का हर ज़र्रा-ए-सर-ज़मीन-ए-गोकुल दारा है जमाल-ए-दिलबरी का...

भूल ही जाएँ हम को ये तो न हो लोग मेरे लिए दुआ न करें...

हाइल थी बीच में जो रज़ाई तमाम शब इस ग़म से हम को नींद न आई तमाम शब की यास से हवस ने लड़ाई तमाम शब तुम ने तो ख़ूब राह दिखाई तमाम शब...

दिल में क्या क्या हवस-ए-दीद बढ़ाई न गई रू-ब-रू उन के मगर आँख उठाई न गई हम रज़ा-शेवा हैं तावील-ए-सितम ख़ुद कर लें क्या हुआ उन से अगर बात बनाई न गई...

क़वी दिल शादमाँ दिल पारसा दिल तिरे आशिक़ ने भी पाया है क्या दिल लगा दो आग उज़्र-ए-मस्लहत को कि है बे-ज़ार इस शय से मिरा दिल...

वो चुप हो गए मुझ से क्या कहते कहते कि दिल रह गया मुद्दआ कहते कहते मिरा इश्क़ भी ख़ुद-ग़रज़ हो चला है तिरे हुस्न को बेवफ़ा कहते कहते...

तिरे दर्द से जिस को निस्बत नहीं है वो राहत मुसीबत है राहत नहीं है जुनून-ए-मोहब्बत का दीवाना हूँ मैं मिरे सर में सौदा-ए-हिकमत नहीं है...

उन को जो शुग़्ल-ए-नाज़ से फ़ुर्सत न हो सकी हम ने ये कह दिया कि मोहब्बत न हो सकी शुक्र-ए-जफ़ा भी अहल-ए-रज़ा ने किया अदा उन से यही नहीं कि शिकायत न हो सकी...

बदल-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार कहाँ से लाऊँ अब तुझे ऐ सितम-ए-यार कहाँ से लाऊँ पुर्सिश-ए-हाल पे है ख़ातिर-ए-जानाँ माइल जुरअत-ए-कोशिश-ए-इज़हार कहाँ से लाऊँ...

राह में मिलिए कभी मुझ से तो अज़-राह-ए-सितम होंट अपना काट कर फ़ौरन जुदा हो जाइए...

दुआ में ज़िक्र क्यूँ हो मुद्दआ का कि ये शेवा नहीं अहल-ए-रज़ा का तलब मेरी बहुत कुछ है मगर क्या करम तेरा है इक दरिया अता का...

हक़ीक़त खुल गई 'हसरत' तिरे तर्क-ए-मोहब्बत की तुझे तो अब वो पहले से भी बढ़ कर याद आते हैं...

भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं इलाही तर्क-ए-उल्फ़त पर वो क्यूँकर याद आते हैं न छेड़ ऐ हम-नशीं कैफ़ियत-ए-सहबा के अफ़्साने शराब-ए-बे-ख़ुदी के मुझ को साग़र याद आते हैं...

'हसरत' बहुत है मर्तबा-ए-आशिक़ी बुलंद तुझ को तो मुफ़्त लोगों ने मशहूर कर दिया...