कृष्ण
मथुरा कि नगर है आशिक़ी का दम भरती है आरज़ू इसी का हर ज़र्रा-ए-सर-ज़मीन-ए-गोकुल दारा है जमाल-ए-दिलबरी का बरसाना-ओ-नंद-गाँव में भी देख आए हैं जल्वा हम किसी का पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ था हर नग़्मा-ए-कृष्ण बाँसुरी का वो नूर सियाह या कि हसरत सर-चश्मा फ़रोग़-ए-आगही का

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