Kabir
( 1399 )

Kabir (Hindi: कबीर) (IAST: Kabīr) was a 15th-century Indian mystic poet and saint, whose writings influenced Hinduism's Bhakti movement and his verses are found in Sikhism's scripture Adi Granth. His early life was in a Muslim family, but he was strongly influenced by his teacher, the Hindu bhakti leader Ramananda. Kabir is known for being critical of both Hinduism and Islam, stating that the former were misguided by the Vedas and the latter by the Quran, and questioning their meaningless rites of initiation such as the sacred thread and circumcision respectively. During his lifetime, he was threatened by both Hindus and Muslims for his views. When he died, both Hindus and Muslims he had inspired claimed him as theirs. More

हरिजन सेती रूसणा, संसारी सूँ हेत । ते नर कदे न नीपजैं, ज्यूं कालर का खेत ॥1॥ भावार्थ - हरिजन से तो रूठना और संसारी लोगों के साथ प्रेम करना - ऐसों के अन्तर में भक्ति-भावना कभी उपज नहीं सकती, जैसे खारवाले खेत में कोई भी बीज उगता नहीं । मूरख संग न कीजिए, लोहा जलि न तिराइ ।...

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥ जो सुख पाऊँ राम भजन में सो सुख नाहिं अमीरी में मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥...

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय॥ जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं॥...

हंसा चलल ससुररिया रे, नैहरवा डोलम डोल॥टेक॥ ससुरा से पियवा चिठिया भेजायल, नैहरा भाय गेलै शोर। खाना-पीना मनहुँ न भावै, अँखियाँ से ढरकन लोर रे॥नै.॥ माई-बहिनियाँ फूटि-फूटि रोवे, सुगना उड़ि गेल मोर।...

चेत करु जोगी, बिलैया मारै मटकी॥टेक॥ ब्रह्मा के मारै विष्णु के मारै। नारद बाबा के सभा बिच पटकी॥1॥ ज्ञानी के मारै ध्यानी के मारै।...

का लै जैबौ, ससुर घर ऐबौ॥टेक॥ गाँव के लोग जब पूछन लगिहैं, तब तुम क रे बतैबी॥1॥ खोल घुँघट जब देखन लगिहैं, तब बहुतै सरमैबौ॥2॥ कहत कबीर सुनो भाई साधो, फिर सासर नहिं पैबौ॥3॥...

मुनियाँ पिंजड़ेवाली ना, तेरो सतगुरु है बेपारी॥टेक॥ पाँच तत्त का बना है पींजड़ा, तामें रहती मुनियाँ। उड़िके मुनियाँ डार पर बैठी, झींखन लागी सारी दुनिया॥1॥ अलग डाल पर बैठी मुनियाँ, पिये प्रेम रस बूटी।...

सतगुर के सँग क्यों न गई री॥टेक॥ सतगुर के सँग जाती सोना बनि जाती, अब माटी के मैं मोल भई री॥1॥ सतगुर हैं मेरे प्रान-अधारा,...

`कबीर' माया पापणी, फंध ले बैठी हाटि। सब जग तौ फंधै पड्या,गया कबीरा काटि॥ `कबीर' माया मोहनी, जैसी मीठी खांड। सतगुरु की कृपा भई, नहीं तौ करती भांड॥...

साधु सती और सूरमा, इनका मता अगाध। आशा छाड़े देह की, तिनमें अधिका साध॥ साधु सती और सूरमा, कबहु न फेरे पीठ। तीनों निकासी बाहुरे, तिनका मुख नहीं दीठ॥...