बेल-सी वह मेरे भीतर
बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है, बढ़ती है। उस की कलियाँ हैं मेरी आँखें, कोंपलें मेरी अँगुलियों में अँकुराती हैं; फूल-अरे, यह दिल में क्या खिलता है! साँस उस की पँखुड़ियाँ सहलाती हैं। बाँहें उसी के वलय में बँध कसमसाती हैं। बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है, बढ़ती है, जितना मैं चुकता जाता हूँ, वह मुझे ऐश्वर्य से मढ़ती है!

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