उखड़ा-सा दिन
उखड़ा-सा दिन, उखड़ा-सा नभ, उचटे-से हेमन्ती बादल- क्या इसी शून्य में खोएगा अपना दुलार का अन्तिम पल? ढलते दिन में तन्द्रा-सी से सहसा जग कर अलसाया-सा, करतल पर तेरे कुन्तल धर मैं बैठा हूँ भरमाया-सा- भटकी-सी मेरी अनामिका सीमन्त टोहती है तेरा... है जहाँ किसी एकाकी ने संयोग लिखा तेरा-मेरा। यह लघु क्षण अक्षर है, अव्यय, तद्गत हम, सुख-आलस्य-विकल; ओ दिन अलसाये हेमन्ती, धीरे ढल, धीरे-धीरे ढल!

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