बाल-बोध
वह बाल बोध था मेरा निराकार निर्लेप भाव में भान हुआ जब तेरा। तेरी मधुर मूर्ति, मृदु ममता, रहती नहीं कहीं निज समता, करुण कटाक्षों की वह क्षमता, फिर जिधर भव फेरा; अरे सूक्ष्म, तुझमें विराट ने डाल दिया है डेरा। वह बाल-बोध था मेरा ।। पहले एक अजन्मा जाना, फिर बहु रूपों में पहचाना, वे अवतार चरित नव नाना, चित्त हुआ चिर चेरा; निर्गुण, तू तो निखिल गुणों का निकला वास - बसेरा। वह बाल-बोध था मेरा। डरता था मैं तुझसे स्वामी, किन्तु सखा था तू सहगामी, मैं भी हूँ अब क्रीड़ा-कामी, मिटने लगा अँधेरा; दूर समझता था मैं तुझको तू समीप हँस-हेरा। वह बाल-बोध था मेरा। अब भी एक प्रश्न था--कोऽहं ? कहूँ कहूँ जब तक दासोऽहं तन्मयता बोल उठी सोऽहं ! बस हो गया सवेरा; दिनमणि के ऊपर उसकी ही किरणों का है घेरा वह बाल-बोध था मेरा।

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