निर्बल का बल
निर्बल का बल राम है। हृदय ! भय का क्या काम है।। राम वही कि पतित-पावन जो परम दया का धाम है, इस भव – सागर से उद्धारक तारक जिसका नाम है। हृदय, भय का क्या काम है।। तन-बल, मन-बल और किसी को धन-बल से विश्राम है, हमें जानकी – जीवन का बल निशिदिन आठों याम है। हृदय, भय का क्या काम है।।

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