मौन ही मुखर है
कितनी सुन्दर थी वह नन्हीं-सी चिड़िया कितनी मादकता थी कण्ठ में उसके जो लाँघ कर सीमाएँ सारी कर देती थी आप्लावित विस्तार को विराट के कहते हैं वह मौन हो गई है- पर उसका संगीत तो और भी कर रहा है गुंजरित- तन-मन को दिगदिगन्त को इसीलिए कहा है महाजनों ने कि मौन ही मुखर है, कि वामन ही विराट है ।

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