जीवन का विष बोल उठा है
जीवन का विष बोल उठा है! मूँद जिसे रक्खा मधुघट से, मधुबाला के श्यामल पट से, आज विकल, विह्वल सपनों के अंचल को वह खोल उठा है! जीवन का विष बोल उठा है! बाहर का श्रृंगार हटाकर रत्नाभूषण, रंजित अंबर, तन में जहाँ-जहाँ पीड़ा थी कवि का हाथ टटोल उठा है! जीवन का विष बोल उठा है! जीवन का कटु सत्य कहाँ है, यहाँ नहीं तो और कहाँ है? और सबूत यही है इससे कवि का मानस ड़ोल उठा है! जीवन का विष बोल उठा है!

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