जब-जब मेरी जिह्वा ड़ोले
जब-जब मेरी जिह्वा ड़ोले। स्वागत जिनका हुआ समर में, वक्षस्थल पर, सिर पर, कर में, युग-युग से जो भरे नहीं हैं मन के घावों को खोले। जब-जब मेरी जिह्वा ड़ोले। यदि न बन सके उनपर मरहम, मेरी रसना दे कम से कम इतना तो रस जिसमें मानव अपने इन घावों को धोले। जब-जब मेरी जिह्वा ड़ोले। यदि न सके दे ऐसे गायन, बहले जिनको गा मानव मन; शब्द करे ऐसे उच्चारण, जिनके अंदर से इस जग के शापित मानव का स्वर बोले। जब-जब मेरी जिह्वा ड़ोले।

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