देश-विभाजन-३
विदेश की कुनीति हो गई सफल, समस्त जाति की न काम दी अक़ल, सकी न भाँप एक चाल, एक छल, फ़रक़ हमें दिखा न फूल-शूल में। पहन प्रसून हार हम खड़े हुए, कि खार मौत के गले पड़े हुए, कृतज्ञ हम ब्रिटेन के बड़े हुए, कि वह हमें गया ढकेल भूल में। यही स्वतंत्रता-लता गया लगा, कि मुल्क ओर-छोर खून से रंगा, बिखेर बीज फूट के हुआ अलग, स्वदेश सर्व काल को गया ठगा, गरल गया उलीच नीच मूल में।

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