आत्मदीप
मुझे न अपने से कुछ प्यार, मिट्टी का हूँ, छोटा दीपक, ज्योति चाहती, दुनिया जब तक, मेरी, जल-जल कर मैं उसको देने को तैयार| पर यदि मेरी लौ के द्वार, दुनिया की आँखों को निद्रित, चकाचौध करते हों छिद्रित मुझे बुझा दे बुझ जाने से मुझे नहीं इंकार| केवल इतना ले वह जान मिट्टी के दीपों के अंतर मुझमें दिया प्रकृति ने है कर मैं सजीव दीपक हूँ मुझ में भरा हुआ है मान| पहले कर ले खूब विचार तब वह मुझ पर हाथ बढ़ाए कहीं न पीछे से पछताए बुझा मुझे फिर जला सकेगी नहीं दूसरी बार|

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