क्यों रोता है जड़ तकियों पर
क्यों रोता है जड़ तकियों पर! जिनका उर था स्नेह विनिर्मित, भाव सरसता से अभिसिंचित, जब न पसीजे इनसे वे भी, आज पसीजेगें क्या पत्थर! क्यों रोता है जड़ तकियों पर! इनमें मानव का जीवन है, जीवन का नीरव क्रंदन है, नष्ट न कर तू इन बूँदों को मरुथल के ऊपर बरसाकर! क्यों रोता है जड़ तकियों पर! रो तू अक्षर-अक्षर में ही, रो तू गीतों के स्वर में ही, शांत किसी दुखिया का मन हो जिनको सूनेपन में गाकर! क्यों रोता है जड़ तकियों पर!

Read Next