रात-रात भर श्वान भूकते
रात-रात भर श्वान भूकते। पार नदी के जब ध्वनि जाती, लौट उधर से प्रतिध्वनि आती समझ खड़े समबल प्रतिद्वदी दे-दे अपने प्राण भूकते। रात-रात भर श्वान भूकते। इस रव से निशि कितनी विह्वल, बतला सकता हूँ मैं केवल, इसी तरह मेरे उर में भी असंतुष्ट अरमान भूकते। रात-रात भर श्वान भूकते! जब दिन होता ये चुप होते, कहीं अँधेरे में छिप सोते, पर दिन रात हृदय के मेरे ये निर्दय मेहमान भूकते। रात-रात भर श्वान भूकते!

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